ऐसी न क्र अटखेलियाँ ,
कभी पास खींचे, कभी भटकाया !
मेरे इस ,मनको पागल बनाया ,
कभी दे दी खसबू, कभी चमनसे हटाया ;
हे श्याम मेरे ! ये क्या खेल रचाया ?!
ना छोड़, "बेला"को ऐसे बे-सहारा ,
कृ क्या कुछ समजमे न आया ;
तूने श्याम मेरे ! मेरा चैन चुराया !
२३/४/ २०२५
८. ०० ए एम

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