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स्व. श्री राकेशजी को श्रद्धांजलि

 

हे प्रभु ! इतने उत्सुक थे ,
मिलने ,दोस्त, राकेश से? ! 
तो , वहीं  मिल लेते , चन्द्रमा से ! 
वो भी तो राकेश ही है  - अधिपति - हैं  नक्षत्रों के ? ! 
वैसे तो कहते हो ,ज्योति है मेरी राकेश में ;
तो फिर क्यों भेजे यमराज को पाश लेके ? 
वहीं    मिल लेते चन्द्रमा से ,
और सुकून राकेश-मिलन का ले लेते ! 
काहे दूर किया अज़ीज़ो से ?
और "बेला" चमन मुरझाया फूलों  से ?! 

अब बुला ही लिया है तो , 
रखना , शाश्वत शान्ति और उर्ध्व गति में !;
बाहें  फैला के बसा लेना अपने ह्रदय में  ! 
                                       ७/१/२०२६ 
                                          ३.०० पि.एम्.