रे मुरख ! काहे जग देखत रह्यो ? !
देख, तुझे चक्षु चार है दियो !
दुइ चरम और दुइ भीतर पलकयो !
देख,त्रिलोक में एक "वो"ही बस्यो |
"वो"ही कल्याणकारी, कोई न दूजो ,
दंभी संसार में प्रपंची प्रेम है पायो ;
जान ले , सतस्वरूप को ,जो है सांवरो ,
"बेला"समज, नाही तो जनम तेरो विफल रह्यो !
१५/११/२०२४
10. ० .ए एम्.
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